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विनोद कुमार उपाध्याय

हमारे आदर्श

अंतिम व्यक्ति की सेवा, राष्ट्र की एकता और सांस्कृतिक गौरव: जिन विचारों पर हम चलते हैं, वे इन्हीं जीवनों से आते हैं।

आज का विचार

दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दीजिए और आपके पास सर्वश्रेष्ठ लौटकर आएगा।
स्वामी दयानन्द सरस्वती (आर्य समाज)स्वामी दयानन्द सरस्वती (आर्य समाज)

हमारे आदर्श

भारत वर्ष के महान नायक

  • महाराणा प्रताप
    ये संसार कर्मवीरों की ही सुनता है। अतः अपने कर्म के मार्ग पर अडिग और प्रशस्त रहो।
    महाराणा प्रताप (1540–1597)
  • शिवाजी महाराज
    सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता, फिर परमेश्वर। अतः पहले खुद को नहीं, राष्ट्र को देखना चाहिए।
    शिवाजी महाराज (1630–1680)
  • गुरु गोबिन्द सिंह
    सबसे महान सुख और स्थायी शांति तब प्राप्त होती है, जब कोई अपने भीतर से स्वार्थ को समाप्त कर देता है।
    गुरु गोबिन्द सिंह (1666–1708)
  • सम्राट अशोक
    प्रत्येक समय, मैं चाहे भोजन कर रहा हूँ या शयनागार में हूँ, प्रतिवेदक प्रजा की स्थिति से मुझे अवगत करें। मैं सर्वत्र कार्य करूँगा। प्रजा हित मेरा कर्तव्य है और इसका मूल उद्योग तथा कार्य तत्परता है।
    सम्राट अशोक (ई.पू. 304–232)
  • सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
    जीवन में एक बार जो फैसला कर लिया, तो फिर पीछे मुड़कर मत देखो, क्योंकि पलट-पलट कर देखने वाले इतिहास नहीं बनाते।
    सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (ई.पू. 345–297)
  • कौटिल्य (चाणक्य)
    शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है। एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है। शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है।
    कौटिल्य (चाणक्य) (ई.पू. 375–283)
  • कबीर दास
    बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
    कबीर दास (1398–1494)
  • रविदास
    करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस। कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास।
    रविदास (1450–1520)
  • तुलसी दास
    तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है परिहरु बचन कठोर॥
    तुलसी दास (1511–1623)